Lonar jheel



आज से हजारों साल पहले अंतरिक्ष से गिरे एक विशाल उल्कापिंड की वजह से महाराष्ट्र के बुलढाणा में एक ऐसी झील बनी थी जो बेसाल्ट पत्थर में बनी दुनिया की एकमात्र झील है। इस झील का नाम लोनार झील हैं । 
इस झील को नेशनल जिओ हेरिटेज साइट्स में स्थान मिला हुआ है।


 मतलब ये झील भारत के लिए एक सम्मान है। सिर्फ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी ये झील काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस झील के पास कई ऐसे मंदिर है जो आज तो खंडित अवस्था में है लेकिन आज से हजारों साल पहले ये मंदिर काफी विशाल और सुंदर हुआ करते थें। 

लोनार झील महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में स्थित एक खारे पानी की झील है। इसका निर्माण एक उल्का पिंड के पृथ्वी से टकराने के कारण हुआ था। ये झील दुनिया भर के शोधकर्ताओं का मुख्य आकर्षण भी है, यहाँ रिसर्च करने के लिए दुनिया भर से भूवैज्ञानिक आते रहते हैं। तो वहीं महाराष्ट्र के लोगों के लिये ये झील और इसके आसपास के मन्दिर धार्मिक आस्था का केंद्र है। वैसे तो इस झील के बारे में पहले काफी कम लोगों को पता था, लेकिन बीते साल ये झील काफी सुर्खियों में आ गया था। 

पिछली साल 5 जून से पहले तक इस झील का पानी हरे रंग का था जो शैवाल ( Algae ) की वजह से अधिकतर झीलों का होता है लेकिन 10 जून आते आते इस झील के पानी का रंग लाल हो गया। भारत के ऐतिहासिक धरोहर रहे इस जगह पर पूरे भारत के वैज्ञानिकों की नजर पड़ी और उनका अभ्यास शुरू हुआ और आखिरकार इसके पानी में हुए बदलाव के पीछे का कारण ढूँढ निकाला गया शोधकर्ताओं का कहना है कि इस झील में क्षार की मात्रा काफी ज्यादा है, और लॉकडाउन के चलते वातावरण में काफी बदलाव हुए थें और साथ में बढ़ती गर्मी के कारण इस झील का काफी पानी सूख गया झील में मौजूद पानी की मात्रा कम हुई अब जैसे ही झील में पानी की मात्रा कम हुई इसका खारापन और बढ़ गया इस खारेपन और वातावरण में हुए बदलाव की वजह से इस झील में मौजूद शैवाल ( Algae ) के व्यवहार में परिवर्तन हुआ जिसका असर इस झील के पानी पर देखने को मिला। 

ऐसा नहीं है कि इस झील के पानी के साथ ऐसी घटना पहली बार हुई है, वर्ष 2006 में इस झील का पानी अचानक सुख गया था और तब यहाँ पानी सूखने के बाद सिर्फ नमक और कुछ रंग बिरंगी खनिजों के टुकड़े दिखाई दे रहे थे। जो उल्कापिंड इस जगह पर टकराया था उसका वजन करीब 10 लाख टन था। इस झील का व्यास लगभग 1.5 किलोमीटर है और इसकी गहराई 500 मीटर है। 

यह झील कब बनी थी इस विषय को लेकर शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों में काफी मतभेद है कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि वो उल्कापिंड यहाँ लगभग 50,000 साल पहले टकराया था, तो कुछ मानते है इसका निर्माण आज से लगभग 5 लाख साल पहले यहाँ हुआ था। इस झील का वर्णन स्कन्दपुराण और पद्मपुराण में भी मिलता है।

 आप सोच रहे होंगे कि अगर यहाँ उल्कपिण्ड गिरी थी तो उसके टुकड़े कहाँ है ? तो इसका जवाब बिल्कुल आसान है- जब कोई उल्कापिण्ड धरती की ओर बढ़ रहा होता है तो उसकी रफ्तार लगभग 10 से 12 किमी प्रति सेकेंड्स की होती है। इसे हाइपर वेलोसिटी कहते हैं । इस रफ़्तार से जब ये उल्कापिंड धरती से टकराता तो इस जोरदार टक्कर की वजह से काफी मात्रा में ऊर्जा निकलती है जिससे लगभग पूरा उल्कापिंड भाप बन जाता है और बचे हुए कुछ टुकड़े आसपास बिखर जाते हैं।