जिंजी किला

आज हम आपको बताने जा रहे हैं जिंजी के उन तीन किलों के बारे मे जिनका इतिहास
 1200 साल से भी ज्यादा है। इन किलों ने आज तक कई राजाओं का इतिहास देखा है। इस किले से चोला, पाण्ड्या, विजयनगर साम्राज्य यहाँ तक कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी कई वर्षों तक राज किया है। 

जिंजी किला तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले में स्थित है। यह चेन्नई से लगभग 157 कि.मी. और पुडुचेरी से 72 कि.मी. की दुरी पर स्थित है। यह किला पहली बार लगभग 9 वीं शताब्दी ई. में चोल राजवंशो द्वारा बनवाया गया था।

 तमिलनाडु के विरुपुरम जिले में जिंजी के तीनों किले बसे हैं । लोगों का मानना हैं कि तीन पहाड़ी पर बने ये तीन किले अंदर के महलों की रक्षा करते थें। यह किला 3 पहाड़ियों के परिसर के मध्य में स्थित है, जिन्हें कृष्णगिरी, राजगिरी और चंद्ररेन्दुर्ग की पहाडियों के नाम से जाना जाता है।
 
सही मायने में दक्षिण भारत का इतिहास उस समय बदल गया जब विजयनगर साम्राज्य को 1556 में तलाइकोटा की लड़ाई में हार का सामना करना पड़ा। जिंजी विजयनगर साम्राज्य का भाग था। 1556 के बाद यह प्रदेश  कृष्णनायक के पास गया जिन्होंने बाद में यहाँ इन 3 किलों का निर्माण करवाया। लेकिन ये 3 किले पहले ऐसे नहीं थे जैसे आज दिखाई देते हैं। 

1677 में जब छ्त्रपति शिवाजी महाराज ने इस किले पर जीत हासिल की उसके बाद उन्होंने इस किले की सुरक्षा की दृष्टिकोण से मजबूती और बढ़ाई। तीनों किलों के चारों ओर दीवारें खड़ी की और यहाँ के मंदिरों का निर्माण करवाया।

यहाँ के इन तीन किलों में से एक मुख्य किला था- राजगिरि किला। ये किला रॉकफोर्ट का सबसे बेहतरीन नमूना है ये जमीन से 900 फ़ीट की ऊंचाई पर बना है। इस किले के ऊपर से निगरानी करने वाले सैनिक आसानी से 10 से 12 किलोमीटर तक दूर तक दुश्मनों पर नजर रखते थे और उपर रखी तोपों के इस्तेमाल से दूर बैठे दुश्मनों का सफाया कर सकते थे।

भारत के इतिहास में पहाड़ पर बनी किलों का बात जब होती है तो इस किले का नाम सबसे पहले लिया जाता है। ये किला चारों तरफ से घने जंगलों से घिरा हुआ है। उपर से इस किले की रचना ऐसी बनाई गयी है कि आक्रमण करके भी इस किले को जीतना नामुमकिन है। खड़ी पहाड़ी से तो ऊपर चढ़ना नामुमकिन था। और इस किले तक पहुँचने के लिए जो सीढ़िया बनाई गई थी वो भी सीधी नही थी किसी भुलभुलैया जैसी घुमावदार थी और ऊपर चढ़ने वाले दुश्मनों के लिए भी कई मुश्किलों से भरी होती थी। नीचे से लेकर ऊपर प्रवेशद्वार तक पहुंचने के लिए लगभग 1200 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती थी। और यहाँ तक चढ़ने के बाद आता है वो पुल जो यहाँ तक पहुँचे दुश्मनों को आगे जाने से रोकने का काम करता था ।

किला का पुल


किले के अंदर जाने के लिए केवल ये एक छोटा पुल ही था। उस जमाने में भी इसे उठाया जा सकता था, जिससे जरूरत पड़ने पर रास्ता बंद हो जाये। छत्रपति शिवाजी महाराज जिन्हें भारतीय नौसेना के जनक माना जाता है, जिन्होंने अपने कार्यकाल में जमीन और समुद्र में कई किलों का निर्माण करवाया था उन्होंने खुद कहा था कि जिंजी के ये तीन किले जीतने के लिए सबसे मुश्किल किले है। मुग़लों ने इस किले पर कब्जा करने की कई बार कोशिश की लेकिन उनकी ये कोशिश हर बार नाकाम रही। ये किले सिर्फ मजबूती के लिए ही मशहूर नहीं है बल्कि यहाँ बसे जिंजी गाँव में बहुत सारे मंदिर भी है और अपने समय में ये मंदिर काफी सुंदर हुआ करते थे।

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राजगिरि से 1 किमी की दूरी पर मौजूद है कृष्णगिरी किला। 500 फ़ीट की ऊँचाई पर बना ये किला भले राजगिरि जितना ऊँचा तो नहीं है लेकिन उससे कम भी नहीं है। इस किले को बड़े बड़े पत्थरों के बीच बनाया गया है और यही पत्थर इस किले की रक्षा करते थें। इन पत्थरों की वजह से दुश्मन सेना को इस किले तक पहुँचने में दिक्कत होती थी। लेकिन ऐसा नही है कि इन किलों को कभी जीता नहीं गया, कई बार इस किले पर अलग अलग राजाओ का शाशन रहा है।

 इस किले को जीतने का एक ही रास्ता था घेराबन्दी। औरंगजेब के सेनापति ने 7 सालो तक लम्बी घेराबंदी करने के बाद इस किले पर कब्जा किया था। लेकिन बाद में छत्रपति शिवाजी महाराज ने 1677 में मुग़लों के कब्जे से इन किलों को छुड़ा लिया। और अगले 20 सालों तक जिंजी मराठाओं के आधिपत्य में रहा। जब आगे चलकर मुग़लो ने यहाँ फिर से घेराबंदी करने के कोशिश की तो मराठाओं ने मुग़लों को 8 सालों तक जिंजी में घुसने नहीं दिया। इतिहास में मुग़लों ने इतनी लम्बी घेराबन्दी कभी नहीं देखी थी।

 औरंगजेब अपनी पूरी जिंदगी में कभी भी छत्रपति शिवाजी महाराज को हरा नहीं सका। और उसकी इस हार के पीछे जिंजी के इन तीन किलों का भी योगदान है। लेकिन बाद में स्वरूपसिंहः नाम के एक बुन्देले सरदार ने जो मुगलो के लिए काम करता था उसने धोके से किले पर कब्जा कर लिया, और आगे 14 सालों तक शासन किया। 18 वीं सदी में फ्रेंच सैनिकों को हरा कर ब्रिटिशों ने इन किलों पर कब्जा कर लिया। और उसके बाद इन किलों का बुरा दौर शुरू हुआ।

ब्रिटिशों की लापरवाही ने इन किलों का काफी नुकसान किया। और भारत के इतिहास के इन अनमोल रत्नों को खंडहर में तब्दील कर दिया। लेकिन इस किले की हालत के लिए जितने ब्रिटिश जिम्मेदार है उतने ही हम भी है क्योंकि आज हम भारतीयों ने भी इस किले को भुला दिया है, जो कई युद्धों और घेराबन्दी का गवाह है।